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अधिगम (सीखना) का अर्थ , प्रभावित करने वाले करक
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अधिगम (Learning) मनुष्य में सीखने का क्रम जन्म से मृत्यु तक चलता रहता है। कुछ सीखने के बाद मानव अनुभवों के आधार पर कार्यरूप देने का प्रयास करता है जिससे उसके व्यवहार में परिवर्तन आता है। व्यवहार में होने वाले इन परिवर्तनों को ही सीखना अथवा अधिगम कहते है। वास्तव में सीखने की प्रक्रिया व्यक्ति की शक्ति और रुचि के कारण विकसित होती है। बच्चों में स्वयं अनुभूति द्वारा भी सीखने की प्रक्रिया होती है, जैसे-बालक किसी जलती वस्तु को छूने का प्रयास करता है और छूने के बाद की अनुभूति से वह यह निष्कर्ष निकालता है कि जलती हुई वस्तु को छूना नहीं चाहिए। अधिगम की यह प्रक्रिया सदैव एक समान नही रहती है। इसमें प्ररेणा के द्वारा वृद्धि एवं प्रभावित करने वाले कारकों से इसकी गति धीमी पड़ जाती है। वुडवर्थ के अनुसार ‘‘नवीन ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया सीखने की प्रक्रिया है।‘‘ क्रो एण्ड क्रो के अनुसार ‘‘सीखना, आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन है।‘‘ स्किनर के अनुसार ‘‘सीखना, व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की एक प्रक्रिया है।‘‘ उपर्युक्त अर्थ एवं परिभाषा के आधार पर सीखने...
निरीक्षण विधि (Observation Method) का बाल व्यवहार में अध्ययन
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हम जानते है अंग्रेजी शब्द के Observation शब्द को निरीक्षण कहा जाता है। जिस का अर्थ होता है निरीक्षण करना या देखना। हम यह भी देखते है इस निरीक्षण में अधिकतर आँखों का प्रयोग किया जाता है। कानों और वाणी का कम।इस विधि के द्वारा प्रत्यक्षत: मिलती है। छोटे बच्चे ना तो प्रश्नों को ठीक से समझ पाते है और न ही उसके उत्तर दे पाते हैं,अतः उनके व्यवहार का अध्ययन करने के लिए निरीक्षणकर्ता बच्चों के समूह में भाग लेता है अथवा दूर खड़ा होकर उनके व्यवहार का अध्ययन करता है। तत्पश्चात् बच्चों के व्यवहार को देखकर वह विश्लेषण द्वारा कुध तथ्यों का पाता लगाता है और उनकी व्याख्या करता है। इस निधि द्वारा बच्चों के सामाजिक विकास, समाज और उनके व्यक्तित्व का सम्बन्ध, उनके नेतृत्व आदि का पता लगाया जाता है। विद्वानों ने निरीक्षण विधि की अलग अलग परिभाषाएं दी हैं – आँक्सफोर्ड कान्साईज डिक्शनरी के अनुसार – “ अवलोकन का अर्थ है – घटनाओं को, जैसे वे प्रकृति में होती हैं, कार्य तथा कारण से सम्बन्ध की दृष्टि से तथ्य देखना तथा नोट करना है। “ प्रो . गुडे एवं हॉट के अनुसार – “ विज्ञान निरीक्षण से आरम्भ होता है और इसे आन्त...
कारक (Case) की परिभाषा
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संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) सम्बन्ध सूचित हो, उसे (उस रूप को) 'कारक' कहते हैं। अथवा- संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) क्रिया से सम्बन्ध सूचित हो, उसे (उस रूप को) 'कारक' कहते हैं। इन दो 'परिभाषाओं' का अर्थ यह हुआ कि संज्ञा या सर्वनाम के आगे जब 'ने', 'को', 'से' आदि विभक्तियाँ लगती हैं, तब उनका रूप ही 'कारक' कहलाता हैं। तभी वे वाक्य के अन्य शब्दों से सम्बन्ध रखने योग्य 'पद' होते है और 'पद' की अवस्था में ही वे वाक्य के दूसरे शब्दों से या क्रिया से कोई लगाव रख पाते हैं। 'ने', 'को', 'से' आदि विभित्र विभक्तियाँ विभित्र कारकों की है। इनके लगने पर ही कोई शब्द 'कारकपद' बन पाता है और वाक्य में आने योग्य होता है। 'कारकपद' या 'क्रियापद' बने बिना कोई शब्द वाक्य में बैठने योग्य नहीं होता। दूसरे शब्दों में- संज्ञा अथवा सर्वनाम को क्रिया से जोड़ने वाले चिह्न अथवा परसर्ग ही कारक कहलाते हैं। जैस...