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विभिन्न अवस्थाओं में सामाजिक विकास (Social Development in Different Stages)

शैशवावस्था में सामाजिक विकास (Social Development in Infancy)   शिशु जन्म से सामाजिक नहीं होता। जन्म के बाद अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों के प्रति प्रतिक्रिया करता है। इस प्रकार सामाजिक प्रक्रिया प्रथम सम्पर्क में प्रारम्भ होकर जीवनपर्यन्त चलती है। हम शिशु के सामाजिक विकास को निम्न पक्रार से व्यक्त कर सकते हैं- आयु माह समाजिक व्यवहार का रूप प्रथम माह ध्वनियों में अन्तर करना द्वितीय माह मानव ध्वनि पहचानना, मुस्कराकर स्वागत करना तृतीय माह माता के लिए प्रसन्नता व माता के अभाव में दुख चतुर्थ माह परिवार के सदस्यों को पहचानना पंचम माह प्रसन्नता व क्रोध में प्रतिक्रिया व्यक्त करना षष्ठम् माह परिचितों से प्यार व अन्य लोगों से भयभीत होना सप्तम माह अनुकरण के द्वारा हाव-भाव सीखना अष्टम एवं नवम् माह हावभाव के द्वारा विभिन्न संवेगों(प्रसन्नता, क्रोध, भय) का प्रदशर्न करना दशम एवं ग्याहरवें माह प्रतिछाया के साथ खेलना, नकारात्मक विकास दूसरे वर्ष की अवधि में बड़ो के कार्यों में सहायता करना, सहयोग, सहानुभूति का विका...

व्योगास्की का सिद्धान्त (Principle of Vygotsky)

Lev Vygotsky (1896-1934) ने संज्ञानात्मक विकास में सामाजिक अंतःक्रिया पर अधिक बल दिया और कहा, कि समुदाय का सीखने में बहुत महत्व है। सामाजिक सीखने (Social Learning) की प्रक्रिया विकास के पहले ही आरम्भ हो जाती है। व्यक्तिगत विकास को भी सामाजिक विकास के बिना नहीं समझा जा सकता। व्यक्ति की उच्च मानसिक प्रक्रिया (Higher Mental Process) की उत्पत्ति (orgin) भी सामाजिक प्रक्रिया से होती है। संस्कृति संज्ञात्मक विकास को दिशा देती है। संज्ञानात्मक विकास में सामाजिक कारक का बहुत महत्व है। व्योगोस्की ने संज्ञानात्मक विकास (cognitive development) के लिए भाषा पर बल दिया। तर्क करना, चिन्तन करना आदि सभी सांस्कृतिक कारकों को मदद करते हैं। सीखने में शिक्षक का महत्वपूर्ण स्थान है। ज्ञान भी सामाजिक सन्दर्भ में होता है। इन्होंने कहा कि- बच्चे ज्ञान का सृजन करते हैं। विकास को सामाजिक सन्दर्भ से अलग नहीं कर सकते। सीखना विकास की ओर निर्देशित कर सकता है। सामाजिक वातावरण सीखने में सहायता करता है। बच्चे की भाषा, दक्षताएं व अनुभव सब व्यक्ति की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से प्रभावित होती है। इस प्रकार व्...

विस्मरण का अर्थ एवं परिभाषा

प्रायः देखा जाता है कि हम किसी वस्तु या घटना को चाहें कितनी ही गहराई से क्यों न याद करें, उसे एक दिन अवश्य भूल जाते हैं इसे ही विस्मरण या विस्मृति कहते है। धारण की असफलता ही विस्मरण है। मनुष्य के सफल जीवन के लिये स्मृति जितनी आवश्यक है, विस्मृति भी उतनी ही आवश्यक है। अच्छी स्मृति का एक महत्वपूर्ण लक्षण व्यर्थ की बातों को भूल जाना भी है। ड्रेवर के अनुसार- किसी समय प्रयास करने पर भी किसी पूर्व अनुभव का स्मरण करने में असफल होना ही विस्मरण है। मन के अनुसार- ग्रहण किए गए तथ्यों को धारण न करना ही विस्मृति है। फ्रायड के अनुसार- विस्मृति की क्रिया के द्वारा हम अपने दुःख देने वाले अनुभवों को स्मृति से निकाल देते है। विस्मरण का महत्व  विस्मरण  का हमारे जीवन में बहुत महत्व है- कटु एवं दुःखद अनुभव को भूल जाना हमारे लिए आवश्यक है। चिन्ता, द्वन्द्व, भय, निराशा उत्पन्न करने वाली घटनाओं का विस्मरण हो जाने से मनुष्य में नए कार्य करने की इच्छा जागृत होती है। यदि व्यक्ति में भूलने की प्रवृति न हो, तो उसका जीना कठिन हो जाय। छात्रों की स्मृति की क्षमता सीमित होती है। इसलिए नए विषय को ...

बाल विकास का अर्थ, आवश्यकता तथा क्षेत्र(ub1sbv)

विकास एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है। जो संसार के प्रत्येक जीव में पाई जाती है। विकास की यह प्रक्रिया गर्भधारण से लेकर मृत्यु पर्यन्त किसी न किसी रूप में  चलती रहती है। इसकी गति कभी तीव्र और कभी मन्द होती है। मानव विकास का अध्ययन मनोविज्ञान  की जिस शाखा के अन्तर्गत किया जाता है, उसे बाल-मनोविज्ञान  कहा जाता है परन्तु अब मनोविज्ञान  की यह शाखा ‘बाल-विकास’ कही जाती है ।  मनोविज्ञान की इस नवीन शाखा का विकास पिछले पचास वर्षों में सर्वाधिक हुआ है। वर्तमान समय में ‘बाल विकास’ के अध्ययनों में मनोवैज्ञानिकों की रूचि दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है क्योकि इस दिशा में हुए अध्ययनों ने बालकों के जीवन को सुखी, समृद्धिशाली और प्रशसंनीय बनाने में महत्वपूर्ण  यागेदान दिया है। बाल विकास का अर्थ  बाल विकास, मनोविज्ञान की एक शाखा के रूप में विकसित हुआ है। इसके अन्तर्गत बालकों  के व्यवहार, स्थितियाँ, समस्याओं तथा उन सभी कारणों  का अध्ययन किया जाता है, जिनका प्रभाव बालक के व्यवहार पर पड़ता है। वर्तमान युग में अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक एवं आर्थिक कारक मानव त...

चिन्तन (Thinking)

चिन्तन एक उच्च ज्ञानात्मक (cognitive) प्रक्रिया है, जिसके द्वारा ज्ञान संगठित होता है। इस मानसिक प्रक्रिया में  स्मृति, कल्पना आदि मानसिक प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं। मानवीय जीवन समस्याओं से भरा हुआ है। हम एक समस्या का हल खोज नहीं पाते, कि दूसरी सामने उपस्थित हो जाती है। ये समस्याएँ प्रयत्न करने से हल हो जाती हैं और कभी कभी प्रयत्न ही चिन्तन को जन्म देता है। चिन्तन का अर्थ एवं परिभाषाएँ - दर्शनशास्त्र ने यह सिद्ध कर दिया है कि विश्व की प्रगति मानव की चिन्तन शक्ति पर निर्भर रहती है। चिन्तन के द्वारा वास्तविकता का पता लगाया जाता है और वास्तविकता विज्ञान को जन्म देती है। अतः चिन्तन शब्द का प्रयोग याद, कल्पना और अनुमान आदि रूपों में प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक प्रकार के चिन्तन की कोई न कोई दिशा अथवा लक्ष्य अवश्य होता है। चिन्तन में बालक क्रियाशील रहता है। चिन्तन वस्तुओं, प्रतिमाओं और प्रतीकों आदि किसी के भी सम्बन्ध में हो सकता है। चिन्तन के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने में निम्न मत सहायक है- (1) वैलेन्टाइन के अनुसार- ‘‘मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से ‘चिन्तन‘ शब्द का प्रयोग उस क्रिया ...

विभिन्न अवस्थाओं में सृजनात्मक विकास (Development of Creativity in different stages )

शैशवावस्था में सृजनात्मक विकास (Development of Creativity in Infancy)  सृजनात्मकता उस योग्यता को बताती है, जो किसी वस्तु को खाजेने या सृजन से सम्बन्धित होती है। शैशवावस्था में शिशु बहुत कल्पनाशील होता है। वो अपनी कल्पना के आधार पर ही नई वस्तुओं का सृजन करता है, जैसे -कागज की नाव बनाना, पंतग बनाना, उड़ने वाला जहाज बनाना, कागज पर तरह-तरह के चित्र बनाना व कल्पना के आधार पर उनमें रंग भरना आदि। शैशवावस्था में सृजनात्मक क्षमता का विकास भली भांति होना आवश्यक है, क्योंकि इसमें हम बालक की कल्पना शक्ति का पूरा प्रयागे करते हैं। इस क्षमता का विकास करके हम उनके भावी जीवन का निर्माण करते है व शिशु के व्यक्तित्व का उचित विकास करते हैं। बाल्यावस्था में सृजनात्मक विकास (Development of Creativity in Childhood)  प्रत्येक बच्चे में सृजन की क्षमता जन्मजात होती है, छोटे बच्चोंके खेलों में यह सृजनात्मक शक्ति स्पष्ट रूप से झलकती है। रचनात्मक कार्यों द्वारा वह सीखते और आग ेबढ़ते हैं। इसके लिए हम बच्चों को कुछ स्वयं करने का अवसर दें, आस पास की वस्तुओं का ज्ञान वो अपनी ज्ञानेन्द्रियों  द्वारा ...

कल्पना

कल्पना- कल्पना गत अनुभवों से सम्बन्धित होती है। इसमें हमेशा नवीनता का तत्व पाया जाता है। बालक को कल्पना में यह यह अनुभव होता है कि कल्पना से सम्बन्धित अनुभव नवीन है। कल्पना को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि कल्पना पूर्व प्रत्यक्षीकृत अनुभवों पर आधारित वह प्रक्रिया है जो रचनात्मक होती है, परन्तु आवश्यक नहीं है कि वह सृजनात्मक भी हो। बालक जब पुनः स्मरण और कल्पना करना सीख लेता है तब उसका सामाजिक सम्पर्क अधिक बढ़ जाता है। इस योग्यता के प्राप्त होते ही बालक उन वस्तुओं के सम्बन्ध में भी विचार करने लग जाता है जो उसके सामने नहीं होती है। कल्पना का महत्व बालक की विभिन्न विकासात्मक प्रक्रियाओं में है। बालक में अनेक क्रियात्मक कौशलों का विकास उसकी कल्पना पर आधारित होता है।  परिभाषाएँ:- रायबर्न के अनुसार- ‘‘कल्पना वह शक्ति है जिसके द्वारा हम अपनी प्रतिभाओं का नये आकार से प्रयोग करते हैं। वह हमको अपने पूर्ण अनुभव को किसी ऐसी वस्तु का निर्माण करने में सहायता देती है, जो पहले कभी नहीं थी।‘‘ मैक्डूगल के शब्दों में –“कल्पना दूरस्थ वस्तुओं के सम्बन्ध का चिन्तन है।“ उपर्युक्त परिभाषाओं...

विभिन्न अवस्थाओं में शारीरिक (Physical Development in different stages)

शैशवावस्था में शारीरिक विकास (Physical Development in Infancy) शैशवावस्था जीवन की सबसे महत्वपूर्ण  अवस्था है। शिशु का शारीरिक विकास जन्म के पूर्व गर्भावस्था से ही प्रारम्भ हो जाता है। इस समय माता के खान-पान रहन-सहन, स्वास्थ्य एवं उसके संवेगात्मक संतुलन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जन्म के बाद शैशवावस्था में विकास में दो सोपान हो जाते हैं जन्म से 3 वर्ष 3 वर्ष से 5 वर्ष   एडलर महादेय ने कहा, कि जन्म के कुछ माह बाद ही ये निश्चित किया जा सकता है कि जीवन में उसका क्या स्थान है।   शैषवावस्था में शारीरिक ( Physical Development in Infancy) भार : जन्म के समय और पूरी शैशवावस्था में बालक का भार बालिका से अधिक होता है। जन्म के समय बालक का भार लगभग 15 पौंड और बालिका का भार लगभग 7.13 पौंड होता है। पहले 6 माह में शिशु का भार दुगुना और एक वर्ष के अन्त में तिगुना हो जाता है। 2   लम्बाई:   शैशावावस्था में 3 वर्ष तक बच्चों के विकास की गति अत्यन्त तीव्र होती है। जन्म के समय शिशु की लम्बाई औसत रूप से 50 सेमी0 होती है। प्रथम वर्ष के अन्त में वह 67 से 70 सेमी0, दू...

स्मृति (Memory)

अर्थ प्रायः देखा जाता है कि जब कोई बच्चा किसी बात को आसानी से सीख जाता है, याद रखता है और पुनःस्मरण कर लेता है, तो अक्सर हम सभी कहते है कि अमुक बच्चे की स्मरण शक्ति अच्छी है। इस प्रकार अच्छी स्मरण शक्ति से हमारा अर्थ सीखना, याद करना तथा पुनःस्मरण है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अचेतन मन में संचित अनुभवों को चेतन मन में लाने की क्रिया को ही स्मृति कहते हैं। जैसे- जब कोई घटना व्यक्ति देखता है तो यह घटना अपने पूर्ण अथवा अंशरूप में उसके अचेतन मन में संचित हो जाती है। किसी कारणवश जब व्यक्ति को इस घटना की याद आती है या उसे याद दिलाई जाती है तो उक्त घटना पुनः उसी रूप में उसके चेतन मन में आ जाती है। वुडवर्थ के अनुसार- ‘‘स्मृति, सीखी हुई वस्तु का सीधा उपयोग है।’’ हिलगार्ड के अनुसार- ‘‘स्मृति, वह मानसिक प्रक्रिया है जिसमें अतीत के सीखे गए ज्ञान, अनुभव या कौशल का पुनः स्मरण किया जाता है। स्टाउट के अनुसार- ‘‘स्मृति, एक ऐसी आदर्श पुनरावृत्ति है, जिसमें अतीत के अनुभव उसी ढंग और क्रम में जागृत होते है, जिस क्रम में वह पूर्व में उपस्थित थे।’’ उपर्युक्त अर्थ एवं परिभाषाओं का यदि हम विश्लेषण करें ...

बाल विकास के आधार एवं उनको प्रभावित करने वाले कारक

बाल-विकास की प्रकृति (Nature of child Development) प्राणी के गर्भ में आने से लेकर पूर्ण प्रौढ़ता प्राप्त होने की स्थिति मानव विकास है। मानव का विकास अनेक कारकों द्वारा होता है। इन कारकों ने दो प्रमुख हैं- जैविक एवं सामाजिक। जैविक विकास का दायित्व माता-पिता पर होता है और सामाजिक विकास का वातावरण पर। बालक लगभग 9 माह अर्थात 280 दिन तक माँ के गर्भ में रहता है और तबसे ही उसके विकास की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। जब भ्रूण विकसित होकर पूर्ण बालक का स्वरूप ग्रहण कर लेता है तो प्राकृतिक नियमानुसार उसे गर्भ से पृथ्वी पर आना ही पड़ता है। तब बालक के विकास की प्रक्रिया प्रत्यक्ष रूप से विकसित होने लगती है। बालक के विकास पर वंशानुक्रम के अतिरिक्त वातावरण का भी प्रभाव पड़ने लगता है। जन्म से सम्बन्धित विकास को वंशानुक्रम तथा समाज से सम्बन्धित विकास को वातावरण कहते हैं। इसे प्रकृति (Nature) तथा पोषण (Nurture) भी कहा जाता है। वुडवर्थ का कथन है कि एक पौधे का वंशक्रम उसके बीच में निहित है और उसके पोषण का दायित्व उसके वातावरण पर है।

रुचि (Interest)

सामान्यतः रुचि का तात्पर्य हमारी पसन्द से होता है। जिस वस्तु में हमारी रुचि होती है, उसमें हमारा ध्यान स्वाभाविक रूप से केन्द्रित हो जाता हैं। यह हमारे मानसिक अनुभवों से सम्बन्ध रखने वाला एक प्रेरक है। मैक्डूगल के अनुसार ‘‘रुचि दिया हुआ अवधान है और अवधान रुचि का क्रियात्मक रूप है।‘‘ क्रो एण्ड क्रो के अनुसार ‘‘रुचि एक प्रेरक शक्ति है, जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।‘‘ रास के अनुसार ‘‘जो वस्तु हमारे साथ अत्यधिक सम्बन्धित होती है, उसके प्रति हमारी रुचि होती है।‘‘ इस प्रकार उपर्युक्त अर्थ एवं परिभाषा से निम्नलिखित तथ्य सामने आते है- रूचि मनुष्य की मानसिक संरचना है | यह जन्मजात एवं अर्जित दोनों होती है | मनुष्यों में रुचियों का विकास जीवन पर्यन्त चलता है | रूचि सीखने में आने वाली समस्याओ को दूर करती है | जिससे थकावट का अनुभव नहीं होता है | हमारी रुचियों का सम्बन्ध हमारी आवश्यकताओं , लक्ष्यों तथा इच्छाओं से होता है | रुचियों के प्रकार (1) जन्मजात रुचियाँ (Inform Interest) (2) अर्जित रुचियाँ (Acquired Interest) जो रुचि अपने...

सीखने का स्थानान्तरण (Transfer of Learning)

सीखने का स्थानान्तरण (Transfer of Learning) अर्थ-जब कोई एक सीखा हुआ कार्य दूसरे सीखने के कार्य को प्रभावित करता है, तो उसे सीखने का स्थानान्तरण कहते है। इस प्रकार का स्थानान्तरण सीखने की क्रिया को सरल बनाता है। जैसे हम विद्यालय में जोड़, घटाना, गुणा आदि सीखते है और उस ज्ञान का प्रयोग बाजार में चीजे खरीदने के समय करते हैं। दूसरी ओर जब पहली सीखी गई क्रिया दूसरे सीखने की क्रिया में बाधक बनती है, तो उसे विपरीत स्थानान्तरण कहते हैं। बी 0 जे 0- अण्डरवुड के अनुसार ‘‘वर्तमान क्रियाओं पर पूर्व अनुभवों का प्रभाव ही अधिगम स्थानान्तरण है।‘‘ क्रो एण्ड क्रो के अनुसार ‘‘जब शिक्षण के एक क्षेत्र में प्राप्त विचार, अनुभव के कार्य की आदत, ज्ञान निपुणता को दूसरी परिस्थिति में प्रयोग किया जाता है, तो वह शिक्षण का स्थानान्तरण कहलाता है।‘‘ ई 0 आर 0 हिलगार्ड के अनुसार ‘‘अधिगम स्थानान्तरण में एक क्रिया का प्रभाव दूसरी क्रिया पर पड़ता है।‘‘ स्थानान्तरण के प्रकार अधिगम स्थानान्तरण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं- सकारात्मक स्थानान्तरण ( Positive Transfer) जब पूर्व ज्ञान, अनुभव या प्रशिक्षण नये प्रकार के सी...

व्यक्तित्व परीक्षण के तरीके एवं समायोजन के उपाय

मानव विकास के साथ-साथ उसके व्यक्तित्व का निर्धारण करना एक समस्या रही है। वर्तमान समय में सम्पूर्ण व्यक्तित्व का मूल्यांकन आवश्यक नहीं माना जाता है, बल्कि किसी प्रयोजन हेतु व्यक्तित्व का मापन आवश्यक होता है। अतः व्यक्तित्व मापन की विभिन्न विधियाँ अलग-अलग प्रयोजनों में प्रयोग की जाती है।  व्यक्तित्व परीक्षण या मापन की विधियाँ- व्यक्तित्व के मापन को तीन प्रकार की विधियों में बाँटा जा सकता है, जो निम्नलिखित है - आत्मनिष्ठ विधियाँ 2. वस्तुनिष्ठ विधियाँ 3. प्रक्षेपण विधियाँ 1.आत्मनिष्ठ या व्यक्तिगत विधियाँ (subjective Methods) इन विधियों के माध्यम से हम व्यक्ति सम्बन्धी सूचना उसी व्यक्ति से या उसके मित्रों अथवा सम्बन्धियों से प्राप्त कर लेते हैं। इन विधियों का आधार उसके लक्षण, अनुभव, उद्देश्य, आवश्यकता, रुचियाँ और और अभिवृतियाँ आदि होती हैं। वह इनके माध्यम से सभी सूचनाएं देता है। इस विधि के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रविधियाँ आती हैं- आत्मकथा ( Autobiography)   इस विधि के द्वारा अध्ययन किये जाने वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व गुणों को कुछ  शीर्षकों में बाँट दिया जाता है, जिसके द्व...

अधिगम के नियम- थार्नडायक के सीखने के मुख्या नियम एवं सीखने में उनका महत्व

अधिगम के नियम ( Law of Learning)   पशु, पक्षी, पौधे, मानव-सभी प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं। इसी प्रकार सीखने के भी कुछ नियम हैं। सीखने की प्रक्रिया इन्हीं नियमों के अनुसार चलती है। ई0एल0थार्नडाइक (E.L.Thorndike)  ने सीखने के कुछ नियम बताएं हैं जिनको प्रयोग से अध्ययन-अध्यापन प्रक्रिया को और अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। उन्होंने सीखने के तीन मुख्य नियम एवं पाँच गौण नियम प्रतिपादित किए हैं। सीखने के मुख्य नियम (Primary Laws of Learning) तत्परता का नियम (Law of Readiness) अभ्यास का नियम (Law of Exercise) परिणाम का नियम (Law of Effect) /प्रभाव का नियम/सन्तोष का नियम (Law of Satisfaction) तत्परता का नियम - जब हम किसी कार्य को सीखने के लिए तैयार या तत्पर होते हैं, तो हम उसे शीघ्र सीख लेते हैं। किसी समस्या को हल करने के लिए प्रयत्नशील होना तत्परता कहलाती है। यदि बच्चे में गणित के प्रश्न हल करने की इच्छा है, तो तत्परता के कारण वह उनको अधिक शीघ्रता और कुशलता से करता है। काम करने में आनंद एवं संतोष का अनुभव करेगा। इसके विपरीत सीखने के लिए तैयार ...

बुद्धि (Intelligence)

बालक/बालिकाओं के मानसिक योग्यताओ का पता लगाने के लिए हम उनकी बुद्धि का पता लगाते हैं। हम अक्सर यह कहते हैं कि अमुक व्यक्ति बहुत बुद्धिमान है व दूसरा व्यक्ति कम बुद्धिमान। सामान्यतः सीखने, तर्क करने, चिन्तन करने, कल्पना करने व अमर्तू चिन्तन करने की योग्यता बुद्धि कहलाती है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकोने बुद्धि की परिभाषाएं दी हैं- वुडवर्थ ‘‘बुद्धि, कार्य करने की विधि है।‘‘ टरमन ‘‘बुद्धि अमर्तू विचारो ंके बारे में सोचने की योग्यता है।‘‘ बिने ‘‘बुद्धि इन चार शब्दों में निहित है-ज्ञान, आविष्कार, निर्देश और आलाचेना।‘‘ रायबर्न ‘‘बुद्धि वह शक्ति है जो हमको समस्याओं का समाधान करने और उद्दयेश्यों  को प्राप्त करने की क्षमता देती है। मोटे तौर पर बुद्धि में निम्नलिखित प्रकार की योग्यता आती है- सीखने की योग्यता अमर्तू चिन्तन करने की योग्यता समस्या का समाधान करने की योग्यता अनुभव से लाभ उठाने की योग्यता संबंधो को समझने की योग्यता अपने वातावरण से सामजस्य करने की योग्यता बुद्धि लब्धि (I.Q.) -विभिन्न मानसिक योग्यता परीक्षणों के माध्यम से हम व्यक्ति की मानसिक आयु का पता लगा लेते हैं। ...

सीखने के वक्र (Learning Curves)

हम अपने जीवन में नई बातें, नये कार्य व नये विषय सीखते हैं जैसे अंग्रेजी पढ़ना, कार चलाना, चित्र बनाना आदि। हमारी इन सबको सीखने की गति आरम्भ से अन्त तक एक सी नहीं होती, यह कभी तेज व कभी धीमी होती है। यदि हम सीखने की गति को एक ग्राफ पेपर पर अंकित करें, तो एक वक्र रेखा बन जायेगी, इसी को सीखने का वक्र ;बनतअमद्ध कहते हैं। दूसरे शब्दों में सीखने का वक्र सीखने में होने वाली उन्नति या अवनति को व्यक्त करता है। गेट्स व अन्य – सीखने के वक्र अभ्यास द्वारा सीखने की मात्रा , गति और उन्नति की सीमा का ग्राफ पर प्रदर्शन करते है | सीखने के वक्र की विशेषताएं-  सीखने में उन्नति - सीखने के वक्र को हम मोटे तौर पर तीन अवस्थाओं में बांट सकते हैं-प्रारम्भिक, मध्य व अन्तिम। सीखने की गति समान नहीं होती अन्तिम अवस्था की तुलना में प्रारम्भिक अवस्था में उन्नति बहुत तीव्र होती है। प्रारम्भिक ( Initial Stage) प्रारम्भिक अवस्था में सीखने की गति में तीव्रता होती है, परन्तु यह सार्वभौम विशेषता नहीं है। मध्य अवस्था ( Middle Stage) जैसे-जैसे व्यक्ति अभ्यास करता जाता है, वैसे-वैसे वो सीखने में  उन्नति क...